(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.43. अध्यायः 043
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
श्रीकृष्णमहिम्नो विस्तरेण कथनाय भीष्मम्प्रति युधिष्ठिरप्रार्थना॥ 1॥ भीष्णेण विष्णोर्जगत्सृष्टिकथाकथनम्॥ 2॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

ततो भीष्मस्य तच्छ्रुत्वा वचः काले युधिष्ठिरः।
ज्ञापनार्थाय सर्वेषां भीष्मं पुनरथाब्रवीत्॥ 2-43-1(13073)
विस्तरेणास्य देवस्य कर्माणीच्छामि सर्वशः।
श्रोतुं भगवतस्तानि प्रब्रवीहि पितामह॥ 2-43-2(13074)
कर्मणामानुपूर्वा च प्रादुर्भावाश्च ये विभोः।
यथा च प्रकृतिः कृष्णे तन्मे ब्रूहि पितामह॥ 2-43-3(13075)
एवमुक्तस्तदा भीष्मः प्रोवाच भरतर्षभ।
युधिष्ठिरममित्रघ्नं तस्मिन्त्राजसमागमे॥ 2-43-4(13076)
समक्षं वासुदेवस्य देवस्येव शतक्रतोः।
कर्माण्यसुकराण्यन्यैराचचक्षे जनाधिप॥ 2-43-5(13077)
शृण्वतां पार्थिवानां च धर्मराजस्य चान्तिके।
इदं मतिमतां श्रेष्ठः कृष्णं प्रति विशाम्पते॥ 2-43-6(13078)
नाम्नैवामन्त्र्य राजेन्द्र चेदिराजमरिन्दमम्।
भीमकर्मा ततो भीष्णो भूयः स इतमब्रवीत्॥ 2-43-7(13079)
करूणामपि राजानं युधिष्ठिरमभाषत। 2-43-8(13080)
भीष्ण उवाच।
वर्तमानामतीतां च शृणु राजन्युधिष्ठिर॥ 2-43-8x(1464)
ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम्।
अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एष भगवान्प्रभुः॥ 2-43-9(13081)
पुरा नारायणो देवः स्वयम्भूः प्रपितामहः।
सहस्रशीर्षः पुरुषो ध्रवोऽनन्तः सनातनः॥ 2-43-10(13082)
सहस्रास्यः सहस्राश्चः सहस्रचरणो विभुः।
सहस्रवाहुः सर्वज्ञो देवो नामसहस्रवान्॥ 2-43-11(13083)
सहस्रमुकुटो देवो विश्वरूपो महाद्युतिः।
अनेकवर्णो देवादिरव्यक्ताद्वै परे स्थितः॥ 2-43-12(13084)
असृजत्सलिलं पूर्वं स च नारायणः प्रभुः।
ततस्तु भगवांस्तोये ब्रह्माणमसृजत्स्वयम्॥ 2-43-13(13085)
ब्रह्मा चतुर्मुखो लोकान्सर्वांस्तानसृजत्स्वयम्।
आदिकाले पुरा ह्येवं सर्वलोकस्य चोद्भवः।
पुरा यः प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे॥ 2-43-14(13086)
ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके चराचरे।
आभूतसम्प्लवे प्राप्ते प्रलीने प्रकृतौ महान्॥ 2-43-15(13087)
एकस्मिष्ठति सर्वात्मा स तु नारायणः प्रभुः।
नारायणस्य चाङ्गानि सर्वदैवानि भारत॥ 2-43-16(13088)
शिरस्तस्य दिवं राजन्नाभिः खं चरणौ मही।
अश्विनौ कर्णयोर्देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ॥ 2-43-17(13089)
इन्द्रवैश्वानरौ देवौ मुखं तस्य महात्मनः।
अन्यानि सर्वदैवानि सर्वाङ्गानि महात्मनः॥ 2-43-18(13090)
सर्वं चापि हरौ संस्थं सूत्रे मणिगणा इव।
आभूतसम्प्लवान्तेऽथ दृष्ट्वा सर्वं तमोन्वितम्॥ 2-43-19(13091)
नारायणो महायोगी सर्वज्ञः परमात्मवान्।
ब्रह्मभूतस्तदात्मानं ब्रह्मणमसृजत्स्वयम्॥ 2-43-20(13092)
सोऽध्यक्षः सर्वभूतानां प्रभूतप्रभवोऽच्युतः।
सनत्कुमारं रुद्रं च सप्तर्षीश्च तपोधनात्॥ 2-43-21(13093)
सर्वमेवासृजद्ब्रह्मा तथा लोकांस्तथा प्रजाः।
ते च तद्व्यसृजंस्तत्र प्राप्तकाले युधिष्ठिर॥ 2-43-22(13094)
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम्।
कल्पानां बहुकोट्यश्चसमतीतास्तु भारत॥ 2-43-23(13095)
आभूतसम्प्लवाश्चैव बहुधाऽद्धाऽपचक्रमुः।
मन्वन्तरयुगा राजन्सङ्कल्पो भूतसम्प्लवाः॥ 2-43-24(13096)
चक्रवत्परिवर्तन्ते सर्वं विषमुखं जगत्।
सृष्ट्वा चतुर्मुखं देवं देवो नारायणः प्रभुः॥ 2-43-25(13097)
स लोकानां हितार्थाय क्षीरोदे वसति प्रभुः।
ब्रह्मा च सर्वलोकानां लोकस्य च पितामहः॥ 2-43-26(13098)
ततो नारायणो देवः सर्वस्य प्रपितामहः। ॥ 2-43-27(13099)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 43 ॥

Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Footnotes
2-43-25 विषमुखं जलादिकम्॥


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